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आर्य समाज मंदिर लखनऊ

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आर्य समाज एक हिन्दू सुधार आंदोलन है जिसकी स्थापना स्वामी दयानन्द सरस्वती ने १८७५ में बंबई में मथुरा के स्वामी विरजानंद की प्रेरणा से की थी। यह आंदोलन पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू धर्म में सुधार के लिए प्रारंभ हुआ था। आर्य समाज में शुद्ध वैदिक परम्परा में विश्वास करते थे तथा मूर्ति पूजा, अवतारवाद, बलि, झूठे कर्मकाण्ड व अंधविश्वासों को अस्वीकार करते थे। इसमें छुआछूत व जातिगत भेदभाव का विरोध किया तथा स्त्रियों व शूद्रों को भी यज्ञोपवीत धारण करने व वेद पढ़ने का अधिकार दिया था। स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रन्थ आर्य समाज का मूल ग्रन्थ है। आर्य समाज का आदर्श वाक्य है: कृण्वन्तो विश्वमार्यम्, जिसका अर्थ है - विश्व को आर्य बनाते चलो।
प्रसिद्ध आर्य समाजी जनों में स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी श्रद्धानन्द, महात्मा हंसराज, लाला लाजपत राय, भाई परमानन्द, पंडित गुरुदत्त, स्वामी आनन्दबोध सरस्वती, स्वामी अछूतानन्द, चौधरी चरण सिंह, पंडित वन्देमातरम रामचन्द्र राव आदि आते हैं।
आर्य शब्द का अर्थ है श्रेष्ठ और प्रगतिशील। अतः आर्य समाज का अर्थ हुआ श्रेष्ठ और प्रगतिशीलों का समाज, जो वेदों के अनुकूल चलने का प्रयास करते हैं। दूसरों को उस पर चलने को प्रेरित करते हैं। आर्यसमाजियों के आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम राम और योगिराज कृष्ण हैं। महर्षि दयानंद ने उसी वेद मत को फिर से स्थापित करने के लिए आर्य समाज की नींव रखी। आर्य समाज के सब सिद्धांत और नियम वेदों पर आधारित हैं। आर्य समाज की मान्यताओं के अनुसार फलित ज्योतिष, जादू-टोना, जन्मपत्री, श्राद्ध, तर्पण, व्रत, भूत-प्रेत, देवी जागरण, मूर्ति पूजा और तीर्थ यात्रा मनगढ़ंत हैं, वेद विरुद्ध हैं। आर्य समाज सच्चे ईश्वर की पूजा करने को कहता है, यह ईश्वर वायु और आकाश की तरह सर्वव्यापी है, वह अवतार नहीं लेता, वह सब मनुष्यों को उनके कर्मानुसार फल देता है, अगला जन्म देता है, उसका ध्यान घर में किसी भी एकांत में हो सकता है।

इसके अनुसार दैनिक यज्ञ करना हर आर्य का कर्त्तव्य है। परमाणुओं को न कोई बना सकता है, न उसके टुकड़े ही हो सकते हैं। यानी वह अनादि काल से हैं। उसी तरह एक परमात्मा और हम जीवात्माएं भी अनादि काल से हैं। परमात्मा परमाणुओं को गति दे कर सृष्टि रचता है। आत्माओं को कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। फिर चार ऋषियों के मन में २०,३७८ वेदमंत्रों का अर्थ सहित ज्ञान और अपना परिचय देता है। सत्यार्थ प्रकाश आर्य समाज का मूल ग्रन्थ है। अन्य माननीय ग्रंथ हैं - वेद, उपनिषद, षड् दर्शन, गीता व वाल्मीकि रामायण इत्यादि। महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में इन सबका सार दे दिया है। १८ घंटे समाधि में रहने वाले योगिराज दयानंद ने लगभग आठ हजार किताबों का मंथन कर अद्भुत और क्रांतिकारी सत्यार्थ प्रकाश की रचना की।

मान्यताएँ

ईश्वर का सर्वोत्तम और निज नाम ओम् है। उसमें अनंत गुण होने के कारण उसके ब्रह्मा, महेश, विष्णु, गणेश, देवी, अग्नि, शनि वगैरह अनंत नाम हैं। इनकी अलग- अलग नामों से मूर्ति पूजा ठीक नहीं है। आर्य समाज वर्णव्यवस्था यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र को कर्म से मानता है, जन्म से नहीं। आर्य समाज स्वदेशी, स्वभाषा, स्वसंस्कृति और स्वधर्म का पोषाक है।
आर्य समाज सृष्टि की उत्पत्ति का समय चार अरब ३२ करोड़ वर्ष और इतना ही समय प्रलय काल का मानता है। योग से प्राप्त मुक्ति का समय वेदों के अनुसार ३१ नील १० खरब ४० अरब यानी एक परांत काल मानता है। आर्य समाज वसुधैव कुटुंबकम् को मानता है। लेकिन भूमंडलीकरण को देश, समाज और संस्कृति के लिए घातक मानता है। आर्य समाज वैदिक समाज रचना के निर्माण व आर्य चक्रवर्ती राज्य स्थापित करने के लिए प्रयासरत है। इससमाज में मांस, अंडे, बीड़ी, सिगरेट, शराब, चाय, मिर्च-मसाले वगैरह वेद विरुद्ध होते हैं।

आर्यसमाज का योगदान:-

आर्य समाज शिक्षा, समाज-सुधार एवं राष्ट्रीयता का आन्दोलन था। भारत के ८५ प्रतिशत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, आर्य समाज ने पैदा किया। स्वदेशी आन्दोलन का मूल सूत्रधार आर्यसमाज ही है।स्वामी जी ने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को पुन: हिंदू बनने की प्रेरणा देकर शुद्धि आंदोलन चलाया। आज विदेशों तथा योग जगत में नमस्ते शब्द का प्रयोग बहुत साधारण बात है। एक जमाने में इसका प्रचलन नहीं था - हिन्दू लोग भी ऐसा नहीं करते थे। आर्यसमाजियो ने एक दूसरे को अभिवादन करने का ये तरीका प्रचलित किया। ये एक समय समाजियों की और अब भारतीयों की पहचान बन चुका है।स्वामी दयानन्द ने हिंदी भाषा में सत्यार्थ प्रकाश पुस्तक तथा अनेक वेदभाष्यों की रचना की। एक शिरोल नामक एक अंग्रेज ने तो सत्यार्थ प्रकाश को ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें खोखली करने वाला लिखा था।सन् १८८६ में लाहौर में स्वामी दयानंद के अनुयायी लाला हंसराज ने दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना की थी।सन् १९०१ में स्वामी श्रद्धानन्द ने कांगड़ी में गुरुकुल विद्यालय की स्थापना की।

आर्यसमाज के नियम एवं उद्देश्य :-

  1. सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदिमूल परमेश्वर है।
  2. ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करने योग्य है।
  3. वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढना – पढाना और सुनना – सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।
  4. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये।
  5. सब काम धर्मानुसार, अर्थात सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहियें।
  6. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।
  7. सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिये।
  8. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।
  9. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिये, किंतु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।
  10. सब मनुष्यों को सामाजिक, सर्वहितकारी, नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम पालने सब स्वतंत्र रहें।

आर्य समाज और भारत का नवजागरण:-

आर्य समाज ने भारत में राष्ट्रवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। इसके अनुयायियों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बढ-चढ कर भाग लिया। आर्य समाज के प्रभाव से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर स्वदेशी आन्दोलन आरम्भ हुआ था। स्वामीजी आधुनिक भारत के धार्मिक नेताओं में प्रथम महापुरूष थे जिन्होने 'स्वराज्य' शब्द का प्रयोग किया। आर्य समाज ने हिन्दू धर्म में एक नयी चेतना का आरंभ किया था। स्वतंत्रता पूर्व काल में हिंदू समाज के नवजागरण और पुनरुत्थान आंदोलन के रूप में आर्य समाज सर्वाधिक शक्तिशाली आंदोलन था। यह पूरे पश्चिम और उत्तर भारत में सक्रिय था तथा सुप्त हिन्दू जाति को जागृत करने में संलग्न था। यहाँ तक कि आर्य समाजी प्रचारक फिजी, मारीशस, गयाना, ट्रिनिडाड, दक्षिण अफ्रीका में भी हिंदुओं को संगठित करने के उद्देश्य से पहुँच रहे थे। आर्य समाजियों ने सबसे बड़ा कार्य जाति व्यवस्था को तोड़ने और सभी हिन्दुओं में समानता का भाव जागृत करने का किया।

समाज सुधार

भारत को जिस तरह बिटिंश सरकार का आर्थिक और बाद में राजनीतिक उपनिवेश बना दिया गया था, उसके विरूद्ध भारतीयों की ओर से तीव्र प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। चूंकि भारत धीरे-धीरे पश्चिमी विचारों की ओर बढ़ने लगा था, अतः प्रतिक्रिया सामाजिक क्षेत्र से आना स्वाभाविक कार्य थी। यह प्रतिक्रिया १९वीं शताब्दी में उठ खड़े हुए सामाजिक सुधार आन्दोलनों के रूप में सामने आई। ऐसे ही समाज सुधार आंदोलनों में आर्यसमाज का नाम आता है। आर्यसमाज ने विदेशी जुआ उतार फेंकने के लिए, समाज में स्वयं आंतरिक सुधार करके अपना कार्य किया। इसने आधुनिक भारत में प्रारंभ हुए पुर्नजागरण को नई दिशा दी। साथ ही भारतीयों में भारतीयता को अपनाने, प्राचीन संस्कृति को मौलिक रूप में स्वीकार करने, पश्चिमी प्रभाव को विशुद्ध भारतीयता यानी वेदों की ओर लोटो के नारे के साथ समाप्त करने तथा सभी भारतीयों को एकताबद्ध करने के लिए प्रेरित किया।
१९वीं शताब्दी में भारत में समाज सुधार के आंदोलनों में आर्यसमाज अग्रणी था। १८७५ में स्थापना के शीघ्र बाद ही इसकी प्रसिद्धि तत्कालीन समाज विचारकों, आचार्यों, समाज सुधारकों आदि को प्रभावित करने में सफल हुई, और कुछ वर्षों बाद ही आर्यसमाज की संपूर्ण भारत के प्रमुख शहरों में शाखायें स्थापित हो गई। स्वामीजी के विद्वतापूर्ण व्याख्यानों तथा चमत्कारिक व्यक्तित्व ने युवाओं को आर्यसमाज की ओर मोड़ा। अन्य समकालीन सामाजिक धार्मिक आंदोलनों की अपेक्षा आर्यसमाज सही अर्था में अधिक राष्ट्रवादी था। अयह भारत में पनप रहे पश्चिमीकरण के विरूद्ध अधिक आक्रमणकारी स्वभाव रखने वाला आंदोलन था।
आर्य समाज ने अपनी स्थापना से ही सामाजिक कुरीतियों के विरूद्ध आन्दोलन का शंखनाद किया, जैसे-जातिवादी जड़मूलक समाज को तोड़ना, महिलाओं के लिए समानाधिकार, बालविवाह का उन्मूलन, विधवा विवाह का समर्थन, निम्न जातियों को सामाजिक अधिकार प्राप्त होना आदि। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना के पीछे उपरोक्त सामाजिक नवजागरण को मुख्य आधार बनाया। उनका विश्वास था कि नवीन प्रबुद्ध भारत में, नवजागृत होते समाज में, नये भारत का निर्माण करना है तो समाज को बन्धनमुक्त करना प्रथम कार्य होना चाहिए। स्वयं ब्राह्मण होते हुए भी स्वामी जी ने ब्राह्मणों की सत्ता के खण्डन का प्रतिपादन किया और धार्मिक अंधविश्वास व कर्मकाण्डों की तीव्र भर्त्सना की। अल्पकाल में ही वे भारत के समाज सुधार के क्षेत्र में नवीन ज्ञान-ज्योति के रूप में उदयीमान हुए। इसमें उन्होनें पाया कि भारतीय युवा पाश्चात्य अनुकरण पर जोर दे रहा है। अतः उन्होनें पाश्चात्य संस्कृति पर शक्तिशाली प्रहार किया और भारतीय गौरव को सदैव ऊंचा किया।
सामान्यतः स्वामीजी ने भारतीय समाज तथा हिन्दूधर्म में प्रचालित दोषों को उजागर करने के साथ ही आंचलिक पंथों और अन्य धर्मो की भी आलोचना की। पुरोहितवाद पर करारा प्रहार करते हुए स्वामीजी ने माना था कि स्वार्थों और अज्ञानी पुरोहितों ने पुराणों जैसे ग्रंथो का सहारा लेकर हिन्दू धर्म का भ्रष्ट किया है। स्वामी जी धर्म सुधारक के रूप में मूर्तिपूजा, कर्मकाण्ड, पुराणपंथी, तन्त्रवाद के घोर विरोधी थे। इसके लिए उन्होने वेदों का सहारा लेकर विभिन्न दृष्टांत किए। इससे इन्होने सुसुप्त भारतीय जनमानस को चेतन्य करने का अदभुत प्रयास किया। स्वामी जी ने हिन्दुओं को हीन, पतित और कायर होने के भाव से मुक्त किया और उनमें उत्कट आत्मविश्वास जागृत किया। फलस्वरूप समाज पश्चिम की मानसिक दासता के विरूद्ध दृढ आत्मविश्वास तथा संकल्प के साथ विद्रोह कर सके। इन्ही क्रांतीकारी विचारों के कारण वेलेंटाइन शिरोल ने स्वामीजी को 'इण्डियन अरनेस्ट' कहा।

हिन्दी-सेवा

आर्य समाज से जुडे लोग भारत की स्वतन्त्रता के साथ-साथ भारत की संस्कृति, भाषा, धर्म, शिक्षा आदि के क्षेत्र में सक्रिय रूप से जुडे रहे। स्वामी दयानन्द की मातृभाषा गुजराती थी और उनका संस्कृत का ज्ञान बहुत अच्छा था, किन्तु केशव चन्द्र सेन के सलाह पर उन्होने सत्यार्थ प्रकाश की रचना हिन्दी में की। दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश जैसा क्रांतिकारी ग्रंथ हिंदी में रचकर हिंदी को एक प्रतिष्ठा दी। आर्यसमाज ने हिन्दी को 'अर्यभाषा' कहा और सभी आर्यसमाजियों के लिये इसका ज्ञान आवश्यक बताया। दयानन्द जी वेदों का की व्याख्या संस्कृत के साथ-साथ हिन्दी में भी की। स्वामी श्रद्धानन्द ने हानि उठाकर भी अनेक पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी में किया जबकि उनका प्रकाशन पहले उर्दू में होता था।
किन्तु पंजाब में पंजाबी भाषा के प्रति आर्यसमाज का रविया नकारात्मक रहा और आर्य समाज ने पंजाबी के लिए प्रचार किया कि यह पंजाबी हिन्दुओं की मातृभाषा नहीं है जबकि पंजाब में सैकडों वर्षों से न केवल हिन्दू पंजाबी बोलते रहे हैं बल्कि पंजाबी साहित्य, सिनेमा में शानदार योगदान देते रहे हैं। पंजाबी में अन्य भारतीय भाषाओं की तरह संस्कृत से व्युत्पन्न शब्द पाए जाते हैं, जबकि आर्य समाज ने मिथ्या प्रचार ने अपूरणीय क्षति की है विवरणआर्य समाज एक हिन्दू सुधार आंदोलन है।स्थापनास्वामी दयानंद सरस्वती ने संभवत: 7 या 10 अप्रैल सन्‌ 1875 ई. को बम्बई (अब मुम्बई) में।[1]उद्देश्यवैदिक धर्म को पुनः शुद्ध रूप से स्थापित करने का प्रयास, भारत को धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिक रूप से एक सूत्र में बांधने का प्रयत्न और पाश्यात्य प्रभाव को समाप्त करना।अर्थ'आर्य' का अर्थ है भद्र एवं 'समाज' का अर्थ है सभा। अत: आर्य समाज का अर्थ है 'भद्रजनों का समाज' या 'भद्रसभा'।संबंधित लेखराजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी रामतीर्थ, लोकमान्य तिलक, रबीन्द्रनाथ ठाकुर, योगी अरविन्द, महात्मा गांधीअन्य जानकारीआर्य समाज का केन्द्र एवं धार्मिक राजधानी लाहौर में थी, यद्यपि अजमेर में स्वामी दयानन्द की निर्वाणस्थली एवं वैदिक-यन्त्रालय (प्रेस) होने से वह लाहौर का प्रतिद्वन्द्वी था। लाहौर के पाकिस्तान में चले जाने के पश्चात आर्य समाज का मुख्य केन्द्र आजकल दिल्ली है।
आर्य समाज उन्नीसवीं शताब्दी का भारतीय इतिहास और साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इतना व्यापक और सूक्ष्म परिवर्तन मध्ययुग में इस्लाम धर्म के सम्पर्क के फलस्वरूप भी न हुआ था। एक ओर तो भारतवर्ष उन्नीसवीं शताब्दी में एक सुदूर स्थित पाश्चात्य जाति का दास बना और दूसरी ओर पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान तथा वैज्ञानिक आविष्कारों से लाभ उठाकर उसने नवीन चेतना प्राप्त की और मध्ययुगीन एवं अनेक पौराणिक कुरीतियों, कुप्रथाओं तथा परम्पराओं से बद्ध जीवन का आलस्य छोड़कर स्फूर्ति प्राप्त की। इतिहास इस बात का साक्षी है कि यह स्फूर्ति और चेतना, राजनीतिक एवं आर्थिक दासत्व की परिस्थिति में, पूर्व और पश्चिम के बीच संघर्ष के रूप में अर्थात भारतीय आध्यात्मिकता और पाश्चात्य भौतिकता के संघर्ष के रूप में, अभिव्यक्त हुई। राजनीतिक और आर्थिक चेतना उसी चेतना का अशंमात्र थी। यही पूर्व और पश्चिम का संघर्ष था, जिसने राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द , स्वामी रामतीर्थ, लोकमान्य तिलक, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, योगी अरविन्द और महात्मा गांधी को जन्म दिया।

वैदिक सिद्धान्त:-

स्वामी दयानन्द के वैदिक सिद्धान्त को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है-'वेद' शब्द का अर्थ ज्ञान है। यह ईश्वर का ज्ञान है इसलिए पवित्र एवं पूर्ण है। ईश्वर का सिद्धान्त दो प्रकार से व्यक्त किया गया है-
चार वेदों के रूप में, जो चार ऋषियों (अग्नि, वायु, सूर्य एवं अगिंरा) को सृष्टि के आरम्भ में अवगत हुए।प्रकृति या विश्व के रूप में, जो वेदविहित सिद्धान्तों के अनुसार उत्पन्न हुआ। वैदिक साहित्य-ग्रन्थ एवं प्रकृति-ग्रन्थ से यहाँ साम्य प्रकट होता है। स्वामी दयानन्द कहते हैं, 'मैं वेदों को स्वत: प्रमाणित सत्य मानता हूँ। ये संशयरहित हैं एवं दूसरे किसी अधिकारी ग्रन्थ पर निर्भर नहीं रहते। ये प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो ईश्वर का साम्राज्य है।' वैदिक साहित्य के आर्य सिद्धान्त को यहाँ संक्षेप में दिया जाता है-वेद ईश्वर द्वारा व्यक्त किये गये हैं जैसा कि प्रकृति के उनके सम्बन्ध से प्रमाणित है।वेद ही केवल ईश्वर द्वारा व्यक्त किये गये हैं क्योंकि दूसरे ग्रन्थ प्रकृति के साथ यह सम्बन्ध नहीं दर्शाते।वे विज्ञान एवं मनुष्य के सभी धर्मों के मूल स्रोत हैं।
आर्य समाज के कर्तव्यों में से सिद्धान्त दो महत्त्वपूर्ण हैं:-
भारत को (भूले हुए) वैदिक पथ पर पुन: चलाना औरवैदिक शिक्षाओं को सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित करना।

आर्य समाज का अर्थ:-

स्वामी दयानन्द ने अपने सिद्धान्तों को व्यावहारिकता देने, अपने धर्म को फैलाने तथा भारत व विश्व को जाग्रत करने के लिए जिस संस्था की स्थापना की उसे 'आर्य समाज' कहते हैं। 'आर्य' का अर्थ है भद्र एवं 'समाज' का अर्थ है सभा। अत: आर्य समाज का अर्थ है 'भद्रजनों का समाज' या 'भद्रसभा'। आर्य प्राचीन भारत का प्रेमपूर्ण एवं धार्मिक नाम है जो भद्र पुरुषों के लिए प्रयोग में आता था। स्वामी जी ने देशभक्ति की भावना जगाने के लिए यह नाम चुना। यह धार्मिक से भी अधिक सामाजिक एवं राजनीतिक महत्त्व रखता है इस प्रकार यह अन्य धार्मिक एवं सुधारवादी संस्थाओं से भिन्नता रखता है, जैसे –ब्रह्मसमाज (ईश्वर का समाज), प्रार्थना समाज आदि । संघटन की दृष्टि से इसमें तीन प्रकार के समाज हैं—
स्थानीय समाजप्रान्तीय समाजसार्वदेशिक समाज।
सदस्यता की नियमावली
स्थानीय समाज की सदस्यता के लिए निम्नलिखित नियमावली है-
आर्य समाज के दस नियमों में विश्वासवेद की स्वामी दयानन्द द्वारा की हुई व्याख्यादि में विश्वाससदस्य की आयु कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिएद्विजों के लिए विशेष दीक्षा संस्कार की आवश्यकता नहीं है किन्तु ईसाई तथा मुसलमानों के लिए एक शुद्धि संस्कार की व्यवस्था है।स्थानीय सदस्य
स्थानीय सदस्य दो प्रकार के हैं-
प्रथम, जिन्हें मत देने का अधिकार नहीं, अर्थात अस्थायी सदस्य;द्वितीय, जिन्हें मत देने का अधिकार प्राप्त है, जो स्थायी सदस्य होते हैं। अस्थायित्व काल एक वर्ष का होता है। सहानुभूति दर्शाने वालों की भी एक अलग श्रेणी है।स्थानीय समाज के पदाधिकारी
स्थानीय समाज के निम्नांकित पदाधिकारी होते हैं—
सभापतिउपसभापतिमंत्रीकोषाध्यक्षपुस्तकालयाध्यक्ष।
ये सभी स्थायी सदस्यों द्वारा उनमें से ही चुने जाते हैं।

प्रान्तीय समाज

प्रान्तीय समाज के पदाधिकारी इन्हीं समाजों के प्रतिनिधि एवं भेजे हुए सदस्य होते हैं। स्थानीय समाज के प्रत्येक बीस सदस्य के पीछे एक सदस्य को प्रान्तीय समाज में प्रतिनिधित्व करने का अधिकार है। इस प्रकार इसका गठन प्रतिनिधिमूलक है।

पूजा पद्धति

साप्ताहिक धार्मिक सत्संग प्रत्येक रविवार को प्रात: होता है, क्योंकि सरकारी कर्मचारी इस दिन छुट्टी पर होते हैं। यह सत्संग तीन या चार घण्टे का होता है। भाषण करने वाले के ठीक सामने पूजास्थान में वैदिक अग्निकुण्ड रहता है। धार्मिक पूजा हवन के साथ प्रारम्भ होती है। साथ ही वैदिक मन्त्रों का पाठ होता है। पश्चात प्रार्थना होती है। फिर दयानन्द-साहित्य का प्रवचन होता है, जिसका अन्त समाज गान से होता है। इसमें स्थायी पुरोहित या आचार्य नहीं होता। योग्य सदस्य अपने क्रम से प्रधान-वक्ता या पूजा-संचालक का स्थान ग्रहण करते हैं।

कार्यप्रणाली

आर्य समाज दूसरे प्रचारवादी धर्मों के समान भाषण, शिक्षा, समाचार, पत्र आदि की सहायता से अपना मत-प्रचार करता है। दो प्रकार के शिक्षक है-

प्रथम वेतनभोगी औरद्वितीय, अवैतनिक।

अवैतनिक में स्थानीय वकील, अध्यापक, व्यापारी, डाक्टर आदि लोग होते हैं। जबकि वेतनभोगी सम्पूर्ण समय देने वाले शास्त्रज्ञ और विद्वान प्रचारक होते हैं। पहला दल शिक्षा पर ज़ोर देता है; दूसरा दल उपदेश और संस्कार पर बल देता है। आर्य समाज का प्रत्येक संगठन कुछ हाईस्कूल, गुरुकुल, अनाथालय आदि की व्यवस्था करता है। यह मुख्यत: उत्तर भारतीय धार्मिक आन्दोलन है यद्यपि इसके कुछ केन्द्र दक्षिण भारत में भी हैं। बर्मा तथा पूर्वी अफ्रीका, मॉरीशस, फीजी आदि में भी इसकी शाखाएँ है जो वहाँ बसे हुए भारतीयों के बीच कार्य करती हैं। आर्य समाज का केन्द्र एवं धार्मिक राजधानी लाहौर में थी, यद्यपि अजमेर में स्वामी दयानन्द की निर्वाणस्थली एवं वैदिक-यन्त्रालय (प्रेस) होने से वह लाहौर का प्रतिद्वन्द्वी था। लाहौर के पाकिस्तान में चले जाने के पश्चात आर्य समाज का मुख्य केन्द्र आजकल दिल्ली है।

ईश्वर की स्तुति- प्रार्थना – उपासना के मंत्र ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानिपरासुव । यद् भद्रं तन्न आसुव ॥१॥

मंत्रार्थ–

हे सब सुखोंके दाता ज्ञानके प्रकाशक सकलजगत के उत्पत्तिकर्ताएवं समग्र ऐश्वर्ययुक्तपरमेश्वर! आप हमारेसम्पूर्ण दुर्गुणों, दुर्व्यसनों औरदुखों को दूरकर दीजिए, औरजो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव, सुखऔर पदार्थ हैं, उसको हमें भलीभांतिप्राप्त कराइये।
ओ३म् भूर्भुव: स्व: | तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि | धियो यो न: प्रचोदयात् ||
तूने हमें उत्पन्न किया, पालन कर रहा है तू |
तुझ से ही पाते प्राण हम, दुखियों के कष्ट हरता तू ||
तेरा महान तेज है, छाया हुआ सभी स्थान |
सृष्टि की वस्तु वस्तु में, तु हो रहा है विद्यमान ||
तेरा ही धरते ध्यान हम, मांगते तेरी दया |
ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला ||
वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं। वेदों की 28 हजार पांडुलिपियाँ भारत में पुणे के 'भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' में रखी हुई हैं। इनमें से ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं जिन्हें यूनेस्को ने विरासत सूची में शामिल किया है। यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है। उल्लेखनीय है कि यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सूची 38 है।
वेदों के उपवेद : ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।
वेद के विभाग चार है: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग-स्थिति, यजु-रूपांतरण, साम-गति‍शील और अथर्व-जड़। ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है। इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई।
1.ऋग्वेद : ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान ऋग्वेद सबसे पहला वेद है जो पद्यात्मक है। इसके 10 मंडल (अध्याय) में 1028 सूक्त है जिसमें 11 हजार मंत्र हैं। इस वेद की 5 शाखाएं हैं - शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन। इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा का आदि की भी जानकारी मिलती है। ऋग्वेद के दसवें मंडल में औषधि सूक्त यानी दवाओं का जिक्र मिलता है। इसमें औषधियों की संख्या 125 के लगभग बताई गई है, जो कि 107 स्थानों पर पाई जाती है। औषधि में सोम का विशेष वर्णन है। ऋग्वेद में च्यवनऋषि को पुनः युवा करने की कथा भी मिलती है।
2.यजुर्वेद : यजुर्वेद का अर्थ : यत् + जु = यजु। यत् का अर्थ होता है गतिशील तथा जु का अर्थ होता है आकाश। इसके अलावा कर्म। श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा। यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। यह वेद गद्य मय है। इसमें यज्ञ की असल प्रक्रिया के लिए गद्य मंत्र हैं। इस वेद की दो शाखाएं हैं शुक्ल और कृष्ण।
कृष्ण : वैशम्पायन ऋषि का सम्बन्ध कृष्ण से है। कृष्ण की चार शाखाएं हैं।
शुक्ल : याज्ञवल्क्य ऋषि का सम्बन्ध शुक्ल से है। शुक्ल की दो शाखाएं हैं। इसमें 40 अध्याय हैं। यजुर्वेद के एक मंत्र में च्ब्रीहिधान्यों का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अलावा, दिव्य वैद्य और कृषि विज्ञान का भी विषय इसमें मौजूद है।
सामवेद : साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है। सामवेद गीतात्मक यानी गीत के रूप में है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। 1824 मंत्रों के इस वेद में 75 मंत्रों को छोड़कर शेष सब मंत्र ऋग्वेद से ही लिए गए हैं।इसमें सविता, अग्नि और इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र मिलता है। इसमें मुख्य रूप से 3 शाखाएं हैं, 75 ऋचाएं हैं।
अथर्वदेव : थर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। ज्ञान से श्रेष्ठ कर्म करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्देद आदि का जिक्र है। इसके 20 अध्यायों में 5687 मंत्र है। इसके आठ खण्ड हैं जिनमें भेषज वेद और धातु वेद ये दो नाम मिलते हैं।

वेद :-

प्रश्न :वेद कितने हैं उनके नाम क्या हैं?*
उत्तर : वेद चार हैं-ऋग्वेद,यजुर्वेद,सामवेद,अथर्ववेद।
प्रश्न :वेदों का प्रकाश किसने किया?*
उत्तर :परमपिता परमात्मा ने वेदों का प्रकाश किया।
प्रश्न :वेदों का प्रकाश परमात्मा ने कब किया?*
उत्तर :मानव सृष्टि के प्रारम्भ में परमात्मा ने वेदों का प्रकाश किया।
प्रश्न :वेद का ज्ञान परमात्मा ने किनके द्वारा किया?*
उत्तर :चार ऋषियों के द्वारा-अग्नि,वायु,आदित्य और अंगिरा के द्वारा परमात्मा ने चारों वेदों का प्रकाश किया।
प्रश्न :वेदों में क्या लिखा है?*
उत्तर :वेदों में मनुष्यों के कर्तव्यों तथा सब सत्य विद्याओं और पदार्थों के विषय में सब कुछ लिखा है।
प्रश्न :वेदों की उत्पत्ति को कितने वर्ष हो गये हैं?*
उत्तर :एक अरब छियानवे करोड़ आठ लाख तिरेपन हजार एक सौ अट्ठारह वर्ष(1,96,08,53,118 वर्ष)।
प्रश्न :चतुर्युगी में कितने वर्ष होते हैं?उनके नाम क्या हैं?*
उत्तर :सत्युग - 1728000 वर्ष
त्रेता युग - 1296000 वर्ष
द्वापर युग - 864000 वर्ष
कलियुग - 432000 वर्ष
प्रश्न :क्या वेदों का ज्ञान सबके लिए है?*
उत्तर :हां,परमेश्वर यजुर्वेद के मन्त्र में कहता है कि मैं सब मनुष्यों के लिए इस कल्याणकारी वेद वाणी का उपदेश करता हूं।ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र(सेवक),स्त्री,पुरुष सबके लिए वेद का प्रकाश है।
प्रश्न :चारों वेदों में कितने मन्त्र हैं?कौन से वेद में कितने मन्त्र हैं?*
उत्तर :ऋग्वेद - 10589
यजुर्वेद - 1975
अथर्ववेद - 5977
सामवेद - 1875
योग - 20416 कुल मन्त्र हैं।
प्रश्न :ईश्वर के मुख तो है नहीं फिर वेद ज्ञान कैसे दिया?*
उत्तर :परमात्मा सर्वव्यापक है सबके अन्दर व्यापक है।जैसे मेरे मन में विचार उठते हैं,चिन्तन होता है,अपने मन ही मन में बिना मुख बोल लेता हूं,निर्णय करता हूं,विचारता हूं।किसी बाहरी साधन की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि ये सब क्रियाएं अपने अन्दर हो रही हैं।
जो मुख से बोला,कान से सुना जाता है वह वेद नहीं है वह श्रुति है संज्ञा है।वेद वह है जो परमात्मा,आत्मा में प्रार्दुभूत होता है।
अतः परमात्मा एक नम्बर,जीवात्मा दो नम्बर,बुद्धि तीन नम्बर ,मन चार नम्बर,मुख पांच नम्बर,कान छः नम्बर।
इस प्रकार परमात्मा का ज्ञान,कान तक पहुंचने में पांच सीढ़ी पहले पार हो चुकी हैं।
परमात्मा के आत्मा में व्यापक होने के कारण,परमात्मा के ज्ञान को आत्मा परमात्मा से ग्रहण कर लेता है।जब आत्मा बुद्धि के द्वारा उस ज्ञान को मन तक पहुंचा देता है,मन वाणी को देता है,तथा वाणी से कानों को मिलता है।परमात्मा का ज्ञान आत्मा में प्रेरित होता है उसकी संज्ञा वेद है।
ऋषियों ने जब उस प्राप्त ज्ञान का उच्चारण किया तब उसे कानों से सुनाया गया तब वह श्रुति कहलाया।अतः वेद ज्ञान को देने* के लिए ईश्वर को मुखादि अवयवों की आवश्यकता नहीं।यह ज्ञान तो सीधा ऋषियों की आत्मा में आता है।ऋषि बोलते हैं तो दूसरे सुन सकते हैं।

वेदों का महत्व:-

प्राचीन काल से भारत में वेदों के अध्ययन और व्याख्या की परम्परा रही है। वैदिक सनातन वर्णाश्रम(हिन्दू) धर्म अनुसार आर्षयुग में ब्रह्मा से लेकरवेदव्यासतथा जैमिनि तक के ऋषि-मुनियों और दार्शनिकौं ने शब्द,प्रमाण के रूप में इन्हीं को माने हैं और इनके आधार पर अपने ग्रन्थों का निर्माण भी किये हैं। पराशर, कात्यायन, याज्ञवल्क्य, व्यास, पाणिनी आदि को प्राचीन काल के वेदवेत्ता कहते हैं। वेदों के विदित होने यानि चार ऋषियों के ध्यान में आने के बाद इनकी व्याख्या करने की परम्परा रही है [1]।अतः फलस्वरूप एक ही वेदका स्वरुप भी मन्त्र,ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् के रुपमें चार ही माना गया है। इतिहास(महाभारत)पुराण आदि महान् ग्रन्थ वेदों का व्याख्यानके स्वरूपमें रचे गए। प्राचीन काल और मध्ययुग में शास्त्रार्थ इसी व्याख्या और अर्थांतर के कारण हुए हैं। मुख्य विषय - देव, अग्नि, रूद्र, विष्णु, मरुत, सरस्वती इत्यादि जैसे शब्दों को लेकर हुए। वेदवेत्ता महर्षिस्वामी दयानन्द सरस्वती के विचार में ज्ञान, कर्म, उपासना और विज्ञान वेदों के विषय हैं। जीव, ईश्वर, प्रकृति इन तीन अनादि नित्य सत्ताओं का निज स्वरूप का ज्ञान केवल वेद से ही उपलब्ध होता है।
कणाद ने "तद्वचनादाम्नायस्य प्राणाण्यम्"[2] और "बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे" कहकर वेद को दर्शन और विज्ञान का भी स्रोत माना है। हिन्दू धर्म अनुसार सबसे प्राचीन नियमविधाता महर्षि मनु ने कहा वेदोऽखिलो धर्ममूलम् - खिलरहित वेद अर्थात् समग्रसंहिता,ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदके रूपमें वेद ही धर्म वा धर्मशास्त्र का मूल आधार है। न केवल धार्मिक किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से भी वेदों का असाधारण महत्त्व है। वैदिक युग के आर्यों की संस्कृति और सभ्यताको जानने का एक ही वेद तो साधन है। मानव-जाति और विशेषतः वैदिकौंने अपने शैशव में धर्म और समाज का किस प्रकार विकास किया इसका ज्ञान केवल वेदों से मिलता है। विश्व के वाङ्मय में इनको प्राचीनतम ग्रन्थ( पुस्तक )माना सलोगन लेखन जाता है। [3] आर्यौंका-भाषाओं का मूलस्वरूप निर्धारित करने में वैदिक भाषा अत्यधिक सहायक सिद्ध हुई है।
यूनेस्को ने ७ नवम्बर २००३ को वेदपाठ को मानवता के मौखिक एवं अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृति घोषित किया।

वेदों का काल

वेदों का अवतरण काल वर्तमान सृष्टि के आरंभ के समय का माना जाता है। इसके हिसाब से वेद को अवतरित हुए 2017(चैत्रशुक्ल/तपाःशुक्ल1) को 1,97,29,49,118 वर्ष होंगे। वेद अवतरण के पश्चात् श्रुति के रूप में रहे और काफी बाद में वेदों को लिपिबद्ध किया गया और वेदौंको संरक्षित करने अथवा अच्छि तरहसे समझनेके लिये वेदौंसे ही वेदांगौंको आविस्कार कीया गया |

विवेचना

प्राचीन काल में, भारत में ही, इसकी विवेचना के अंतर के कारण कई मत बन गए थे। मध्ययुग में भी इसके भाष्य (व्याख्या) को लेकर कई शास्त्रार्थ हुए। वैदिक सनातन वर्णाश्रमी इसमें वर्णित चरित्रों देव को पूज्य और मूर्ति रूपक आराध्य समझते हैं जबकि दयानन्द सरस्वती सहित अन्य कईयों का मत है कि इनमें वर्णित चरित्र (जैसे अग्नि, इंद्र आदि) एकमात्र ईश्वर के ही रूप और नाम हैं। इनके अनुसार देवता शब्द का अर्थ है - (उपकार) देने वाली वस्तुएँ, विद्वान लोग और सूक्त मंत्र (और नाम) ना कि मूर्ति-पूजनीय आराध्य रूप।

वैदिक वाङ्ममय का वर्गीकरण

वैदिकौं का यह सर्वस्वग्रन्थ 'वेदत्रयी' के नाम से भी विदित है। पहले यह वेद ग्रन्थ एक ही था जिसका नाम यजुर्वेद था- एकैवासीद् यजुर्वेद चतुर्धाः व्यभजत् पुनः वही यजुर्वेद पुनः ऋक्-यजुस्-सामः के रूप मे प्रसिद्ध हुआ जिससे वह 'त्रयी' कहलाया | बाद में वेद को पढ़ना बहुत कठिन प्रतीत होने लगा, इसलिए उसी एक वेद के तीन या चार विभाग किए गए। तब उनको ऋग्यजुसामके रुपमे वेदत्रयी अथवा बहुत समय बाद ऋग्यजुसामाथर्व के रुप में चतुर्वेद कहलाने लगे। मंत्रों का प्रकार और आशय यानि अर्थ के आधार पर वर्गीकरण किया गया। इसका आधार इस प्रकार है -

वेदत्रयी

वैदिक परम्परा दो प्रकार के है - ब्रह्म परम्परा और आदित्य परम्परा। दोनो परम्परा के वेदत्रयी परम्परा प्राचीन काल मे प्रसिद्ध था। विश्व में शब्द-प्रयोग की तीन शैलियाँ होती है: पद्य (कविता), गद्य और गान। वेदों के मंत्रों के 'पद्य, गद्य और गान' ऐसे तीन विभाग होते हैं -
वेद का पद्य भाग - ऋग्वेद
वेद का गद्य भाग - यजुर्वेद
वेद का गायन भाग - सामवेद
पद्य में अक्षर-संख्या तथा पाद एवं विराम का निश्चित नियम होता है। अतः निश्चित अक्षर-संख्या तथा पाद एवं विराम वाले वेद-मन्त्रों की संज्ञा 'ऋक्' है। जिन मन्त्रों में छन्द के नियमानुसार अक्षर-संख्या तथा पाद एवं विराम ऋषिदृष्ट नहीं है, वे गद्यात्मक मन्त्र 'यजुः' कहलाते हैं और जितने मन्त्र गानात्मक हैं, वे मन्त्र ‘'साम'’ कहलाते हैं। इन तीन प्रकार की शब्द-प्रकाशन-शैलियों के आधार पर ही शास्त्र एवं लोक में वेद के लिये ‘त्रयी’ शब्द का भी व्यवहार किया जाता है। यजुर्वेद गद्यसंग्रह है, अत: इस यजुर्वेद में जो ऋग्वेद के छंदोबद्ध मंत्र हैं, उनको भी यजुर्वेद पढ़ने के समय गद्य जैसा ही पढ़ा जाता है।

चतुर्वेद

द्वापरयुग की समाप्ति के पूर्व वेदों के उक्त चार विभाग अलग-अलग नहीं थे। उस समय तो ऋक्, यजुः और साम - इन तीन शब्द-शैलियोंमे संग्रहात्मक एक विशिष्ट अध्ययनीय शब्द-राशि ही वेद कहलाती थी। पीछे जाकर वेद के समकक्ष मे अथर्व भी सलग्न हो गया, फिर 'त्रयी' के जगह 'चतुर्वेद' कहलाने लगे | गुरु के रुष्ट होने पर जिन्होने सभी वेदौं को आदित्य से प्राप्त किया है उन याज्ञवल्क्य ने अपनी स्मृति मे वेदत्रयी के बाद और पुराणौं के आगे अथर्व को सम्मिलित कर बोला वेदाsथर्वपुराणानि इति .
वर्तमान काल में वेद चार हैं- लेकिन पहले ये एक ही थे। वर्तमान काल में वेद चार माने जाते हैं। परंतु इन चारों को मिलाकर एक ही 'वेद ग्रंथ' समझा जाता था।
एकैवासीत्यजुर्वेदस्तंचतुर्धाःव्यवर्तयत् -गरुड पुराण
लक्षणतः त्रयी होते हुये भी वेद एक ही था , फिर उसको चारभागमे बाँटा गया ।
एक एव पुरा वेद: प्रणव: सर्ववाङ्मय - महाभारत
अन्य नाम
सुनने से फैलने और पीढ़ी-दर-पीढ़ी याद रखने के कारण वा सृष्टिकर्ता ब्रहमाजीने भी अपौरुषेय वाणीके रुपमे प्राप्त करने के कारण श्रुति, स्वतः प्रमाण के कारण आम्नाय, पुरुष(जीव) भिन्न ईश्वरकृत होने से अपौरुषेय इत्यादि नाम वेदों के हैं।
वेद के पठन-पाठन के क्रम में गुरुमुख से श्रवण एवं याद करने का वेद के संरक्षण एवं सफलता की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्व है। इसी कारण वेद को ‘'श्रुति'’ भी कहते हैं। वेद परिश्रमपूर्वक अभ्यास द्वारा संरक्षणीय है, इस कारण इसका नाम ‘'आम्नाय’' भी है। वेदौं की रक्षार्थ महर्षियौं ने अष्ट विकृतियौंकी रचना की है -जटा माला शिखा रेखा ध्वजो दण्डो रथो घनः | अष्टौ विकृतयः प्रोक्तो क्रमपूर्वा महर्षयः || जिसके फलस्वरुप प्राचीन कालके तरह आज भी ह्रस्व, दीर्घ,प्लुत्त और उदात्त,अनुदात्त स्वरित आदिके अनुरुप मन्त्रोच्चारण होता है।

साहित्यिक दृष्टि से

इसके अनुसार प्रत्येक शाखा की वैदिक शब्द-राशि का वर्गीकरण- उपर वर्णित प्रत्येक वेद के चार भाग होते हैं। पहले भाग मन्त्रभाग (संहिता) के अलावा अन्य तीन भागको वेद न मान्नेवाले भी है लेकिन् ऐसा विचार तर्कपूर्ण सिद्ध होते नहि देखा गया हैं। अनादि वैदिक परम्परामें मन्त्र,ब्राह्मण,आरण्यक और उपनिषद एक ही वेदके चार अवयव है। कुल मिलाकर वेदके भाग ये हैं :-
संहिता मन्त्रभाग- यज्ञानुष्ठान मे प्रयुक्त वा विनियुक्त भाग)
ब्राह्मण-ग्रन्थ - यज्ञानुष्ठान मे प्रयोगपरक मन्त्र का व्याख्यायुक्त गद्यभाग में कर्मकाण्ड की विवेचना)
आरण्यक - यज्ञानुष्ठानके आध्यात्मपरक विवेचनायुक्त भाग अर्थके पीछे के उद्देश्य की विवेचना)
उपनिषद - ब्रह्म माया वापरमेश्वर, अविद्या जीवात्मा और जगत् के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णनवाला भाग | जैसा की कृष्णयजुर्वेदमे मन्त्रखण्डमे ही ब्राह्मण है। शुक्लयजुर्वेदे मन्त्रभागमे ही ईसावास्योपनिषद है।
उपर के चारौं खंड वेद होनेपर भी कुछलोग केवल 'संहिता' को ही वेद मानते हैं।

वर्गीकरण का इतिहास

द्वापरयुग की समाप्ति के समय श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी ने यज्ञानुष्ठान के उपयोग को दृष्टिगत रखकर उस एक वेद के चार विभाग कर दिये और इन चारों विभागों की शिक्षा चार शिष्यों को दी। ये ही चार विभाग ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के नाम से प्रसिद्ध है। पैल, वैशम्पायन, जैमिनि और सुमन्तु नामक -चार शिष्यों को क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद की शिक्षा दी। इन चार शिष्यों ने शाकल आदि अपने भिन्न-भिन्न शिष्यों को पढ़ाया। इन शिष्यों के द्वारा अपने-अपने अधीन वेदों के प्रचार व संरक्षण के कारण वे वैदिक ग्रन्थ,चरण ,शाखा, प्रतिशाखा और अनुशाखा के माध्यम से बहुत रुपमे विस्तारित होगये | उन्हीं प्रचारक ऋषियौं के नाम से प्रसिद्ध हैं।

शाखा

पूर्वोक्त चार शिष्यौंने शुरुमे जितने शिष्यौंको अनुश्रवण कराया वे चरणसमुह कहलाये | प्रत्येक चरणसमुहमे बहुतसे शाखा होते है। और इसी तरह प्रतिशाखा,अनुशाखा आदि बन गए । वेद की अनेक शाखाएं यानि व्याख्यान का तरीका बतायी गयी हैं। ऋषि पतञ्जलि के महाभाष्य के अनुसार ऋग्वेद की 21, यजुर्वेद की 101, सामवेद की 1001, अर्थववेद की 9 इस प्रकार 1131 शाखाएं हैं परन्तु आज 12 शाखाएं ही मूल ग्रन्थों में उपलब्ध हैं। वेद की प्रत्येक शाखा की वैदिक शब्दराशि चार भागों में उपलब्ध है: 1. संहिता 2. ब्राह्मण 3. आरण्यक 4. उपनिषद्। कुछ लोग इनमें संहिता को ही वेद मानते हैं। शेष तीन भाग को वेदों के व्याख्या ग्रन्थ मानते हैं। अलग शाखाओं में मूल संहिता तो वही रहती हैं लेकिन आरण्यक और ब्राह्मण ग्रंथों में अन्तर आ जाता है। कइ मंत्र भाग में भी उपनिषद मिलता है जैसा कि शुक्लयजुर्वेद मन्त्रभागमें इसावास्योपनिषद| पुराने समय में जितनी शाखाएं थी उतनी ही मन्त्र, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद होते थे |इतनी शाखाओं के बाबजुद भी आजकल कुल ९ शाखाओं के ही ग्रंथ मिलते हैं। अन्य शाखाऔंमे किसीके मन्त्र,किसीके ब्राह्मण,किसीके आरण्यक और किसीके उपनिषद ही पाया जाता है।इतने ही नही अधिक शाखाऔंके तो उपनिषद ही पाया जाता है ,तभी तो उपनिषद अधिक मिलते हैं।

वेदों के विषय:-

वैदिक ऋषियौ ने वेदों को जनकल्याणमे प्रवृत्त पाया । निस्संदेह जैसा कि -:यथेमां वाचं कल्याणिमावदानि जनेभ्यः वैसा ही वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ता कालानुपूर्व्याभिहिताश्च यज्ञाः तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञम् वेदौं की प्रवृत्तिः जनकल्यण के कार्य मे है । वेद शब्द विद् धातु में घञ् प्रत्यय लगने से बना है । संस्कृत ग्रथों में विद् ज्ञाने और विद्‌ लाभे जैसे विशेषणों से विद् धातु से ज्ञान और लाभ के अर्थ का बोध होता है ।
वेदों के विषय उनकी व्याख्या पर निर्भर करते हैं - अग्नि, यज्ञ, सूर्य, इंद्र (आत्मा तथा बिजली के अर्थ में), सोम, ब्रह्म, मन-आत्मा, जगत्-उत्पत्ति, पदार्थों के गुण, धर्म (उचित-अनुचित), दाम्पत्य, ध्यान-योग, प्राण (श्वास की शक्ति) जैसे विषय इसमें बारंबार आते हैं । यज्ञ में देवता, द्रव्य, उद्देश्य,और विधि आदि विनियुक्त होते हैं। ग्रंथों के हिसाब से इनका विवरण इस प्रकार है -

ऋग्वेद

ऋग्वेद को चारों वेदों में सबसे प्राचीन माना जाता है। इसको दो प्रकार से बाँटा गया है। प्रथम प्रकार में इसे 10 मण्डलों में विभाजित किया गया है। मण्डलों को सूक्तों में, सूक्त में कुछ ऋचाएं होती हैं। कुल ऋचाएं 10520 हैं। दूसरे प्रकार से ऋग्वेद में 64 अध्याय हैं। आठ-आठ अध्यायों को मिलाकर एक अष्टक बनाया गया है। ऐसे कुल आठ अष्टक हैं। फिर प्रत्येक अध्याय को वर्गों में विभाजित किया गया है। वर्गों की संख्या भिन्न-भिन्न अध्यायों में भिन्न भिन्न ही है। कुल वर्ग संख्या 2024 है। प्रत्येक वर्ग में कुछ मंत्र होते हैं। सृष्टि के अनेक रहस्यों का इनमें उद्घाटन किया गया है। पहले इसकी 21 शाखाएं थीं परन्तु वर्तमान में इसकी शाकल शाखा का ही प्रचार है।

यजुर्वेद

इसमें गद्य और पद्य दोनों ही हैं। इसमें यज्ञ कर्म की प्रधानता है। प्राचीन काल में इसकी 101 शाखाएं थीं परन्तु वर्तमान में केवल पांच शाखाएं हैं - काठक, कपिष्ठल, मैत्रायणी, तैत्तिरीय, वाजसनेयी। इस वेद के दो भेद हैं - कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद का संकलन महर्षि वेद व्यास ने किया है। इसका दूसरा नाम तैत्तिरीय संहिता भी है। इसमें मंत्र और ब्राह्मण भाग मिश्रित हैं। शुक्ल यजुर्वेद - इसे सूर्य ने याज्ञवल्क्य को उपदेश के रूप में दिया था। इसमें 15 शाखाएं थीं परन्तु वर्तमान में माध्यन्दिन को जिसे वाजसनेयी भी कहते हैं प्राप्त हैं। इसमें 40 अध्याय, 303 अनुवाक एवं 1975 मंत्र हैं। अन्तिम चालीसवां अध्याय ईशावास्योपनिषद है।

सामवेद:-

यह गेय ग्रन्थ है। इसमें गान विद्या का भण्डार है, यह भारतीय संगीत का मूल है। ऋचाओं के गायन को ही साम कहते हैं। इसकी 1001 शाखाएं थीं। परन्तु आजकल तीन ही प्रचलित हैं - कोथुमीय, जैमिनीय और राणायनीय। इसको पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक में बांटा गया है। पूर्वार्चिक में चार काण्ड हैं - आग्नेय काण्ड, ऐन्द्र काण्ड, पवमान काण्ड और आरण्य काण्ड। चारों काण्डों में कुल 640 मंत्र हैं। फिर महानाम्न्यार्चिक के 10 मंत्र हैं। इस प्रकार पूर्वार्चिक में कुल 650 मंत्र हैं। छः प्रपाठक हैं। उत्तरार्चिक को 21 अध्यायों में बांटा गया। नौ प्रपाठक हैं। इसमें कुल 1225 मंत्र हैं। इस प्रकार सामवेद में कुल 1875 मंत्र हैं। इसमें अधिकतर मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं। इसे उपासना का प्रवर्तक भी कहा जा सकता है।

अथर्ववेद:-

इसमें गणित, विज्ञान, आयुर्वेद, समाज शास्त्र, कृषि विज्ञान, आदि अनेक विषय वर्णित हैं। कुछ लोग इसमें मंत्र-तंत्र भी खोजते हैं। यह वेद जहां ब्रह्म ज्ञान का उपदेश करता है, वहीं मोक्ष का उपाय भी बताता है। इसे ब्रह्म वेद भी कहते हैं। इसमें मुख्य रूप में अथर्वण और आंगिरस ऋषियों के मंत्र होने के कारण अथर्व आंगिरस भी कहते हैं। यह 20 काण्डों में विभक्त है। प्रत्येक काण्ड में कई-कई सूत्र हैं और सूत्रों में मंत्र हैं। इस वेद में कुल 5977 मंत्र हैं। इसकी आजकल दो शाखाएं शौणिक एवं पिप्पलाद ही उपलब्ध हैं। अथर्ववेद का विद्वान् चारों वेदों का ज्ञाता होता है। यज्ञ में ऋग्वेद का होता देवों का आह्नान करता है, सामवेद का उद्गाता सामगान करता है, यजुर्वेद का अध्वर्यु देव:कोटीकर्म का वितान करता है तथा अथर्ववेद का ब्रह्म पूरे यज्ञ कर्म पर नियंत्रण रखता है।

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Court Marriage (under Special Marriage Act,1954)

Marriage Registration Certificate

(Hindu Marriage Act, 1955/ Muslim Marriage Act,1955/ Christian Marriage Act, 1872)